न्यूज़ टुडे एक्सक्लूसिव : यूट्यूबरों को रोकने के लिए बनाए कानून, दिल्ली हाईकोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए सरकार को दिए निर्देश

न्यूज़ टुडे एक्सक्लूसिव : नई दिल्ली 

डा. राजेश अस्थाना, एडिटर इन चीफ, न्यूज़ टुडे मीडिया समूह

*कोर्ट ने कहा कि आज मोबाइल फोन लेकर कोई भी खुद को पत्रकार घोषित कर देता है, जबकि उसके पास न तो पत्रकारिता का प्रशिक्षण होता है, न नैतिक आधार और न ही किसी प्रकार की कोई जवाबदेही, हाईकोर्ट ने कहा कि कई बार स्वयंभू रिपोर्टर खबर बनाने के दौरान लोगों से आक्रामक तरीके से सवाल पूछते हैं और तथ्यों को इस तरह पेश करते हैं, जिससे भ्रामक माहौल बन सकता है। अदालत ने चेतावनी दी कि चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने और बिना सत्यापन के आरोप प्रकाशित करने से सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है, सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।*

दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘स्वयंभू रिपोर्टरों’ (YouTubers/ Content Creators) की गैर-जिम्मेदाराना और भ्रामक पत्रकारिता पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को डिजिटल मीडिया के लिए एक नया कानूनी ढांचा बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मुख्य आधार है, लेकिन इसे डराने-धमकाने और सनसनी फैलाने का ‘कवच’ नहीं बनाया जा सकता।न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने सीलमपुर में साल 2025 में हुए एक मामले में दो आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आज मोबाइल फोन और माइक लेकर कोई भी खुद को रिपोर्टर घोषित कर देता है, जिसके पास न कोई पत्रकारिता का प्रशिक्षण होता है और न ही कोई जवाबदेही। चुनिंदा रिपोर्टिंग, आक्रामक तरीके से सवाल पूछने और बिना सत्यापन के आरोप लगाने से सामाजिक विभाजन और सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।

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यूट्यूबरों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि ऐसे लोगों को रोकने के लिए कानून बनाए। कोर्ट ने कहा कि आज मोबाइल फोन लेकर कोई भी खुद को पत्रकार घोषित कर देता है, जबकि उसके पास न तो पत्रकारिता का प्रशिक्षण होता है, न नैतिक आधार और न ही किसी प्रकार की कोई जवाबदेही, जिससे कई बार समाज में विभाजन की स्थिति पैदा हो जाती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि कई बार स्वयंभू रिपोर्टर खबर बनाने के दौरान लोगों से आक्रामक तरीके से सवाल पूछते हैं और तथ्यों को इस तरह पेश करते हैं, जिससे भ्रामक माहौल बन सकता है। अदालत ने चेतावनी दी कि चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने और बिना सत्यापन के आरोप प्रकाशित करने से सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है, सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

अदालत ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार है और इसकी पूरी तरह रक्षा होनी चाहिए, लेकिन इसे गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता, डराने-धमकाने या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली सामग्री प्रसारित करने का संरक्षण नहीं बनाया जा सकता।

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न्यायालय ने देर से चिंता जाहिर की लेकिन दुरुस्त है। इस पर सरकार को कानून बनाना चाहिए या फिर कम से कम एक SOP जारी करनी चाहिए कि कम से कम पत्रकारिता वैसे व्यक्ति करें, जो पत्रकारिता का किसी प्रकार को कोई कोर्स किया हो। जैसे बिना वकालत की डिग्री लिये वकील नहीं बन सकता है, वैसे ही पत्रकारिता हो।

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